ब्लाग में सार्थक ,नियमित और निरंतर लेखन को लेकर मेरी अपनी चिंतायें रही हैं ! संयोगवश अली भाई नें लगभग इसी मूड की एक पोस्ट दे डाली ! कई बार सोचा कि मैं भी 'रामायण' या किसी प्रसिद्द 'उपन्यास' या फ़िर कबीर और रहीम की रचनाओं को किश्तों में प्रकाशित कर अपने ब्लाग को सक्रिय बनाये रखूँ पर मन नहीं माना ! भला दूसरे की रचनाओं को पुनर्प्रकाशित करने में अपना 'मौलिक चिंतन' कहाँ है ! मेरा कहने का आशय यह है कि दूसरे विद्वानों के "वैचारिक टुकडों" पर पलने से बेहतर है कि आप कुछ न लिखें /ना लिख पायें ! सीमित लेखन से अधिक बुद्धिमत्ता की अभिव्यक्ति भले ही ना हो पर "कार्बन कापी" या "बौद्धिक टुकडखोर" होने से तो बेहतर है ! ब्लाग में स्वतंत्र , सार्थक और निज चिंतन पर आधारित लेखन नहीं कर पाने वाले ब्लागर्स को सक्रियता , लोकप्रियता की बेमानी दौड़ में पड़ने की आवश्यकता कहाँ है ? उचित हो कि वे कम लिखें पर अपना मौलिक तो लिखें !
मेरा अपना कोई बौद्धिक दावा नहीं किंतु किसी अन्य की कापी करने की इच्छा भी नहीं पालता ! सच पूछिए तो मुझे सुधन्या इसी लिए पसंद है कि महीनों से कुल जमा तीन पोस्ट लिखी हैं , उनकी रचनायें भले ही साहित्यिक क्लासिक श्रेणी की ना हों पर रचनाओं का मूल चिंतन , मूल सुर कम से कम अपना स्वयं का तो है ! प्रथम दृष्टया इश्क पगा , 'बे इंतिहा इश्कियाया' हुआ इंसान ! एक दम ओरिजनल !