Friday, November 6, 2009

मुझे सुधन्या इसी लिए पसंद है कि

ब्लाग में सार्थक ,नियमित और निरंतर लेखन को लेकर मेरी अपनी चिंतायें रही हैं ! संयोगवश अली भाई नें लगभग इसी मूड की एक पोस्ट दे डाली ! कई बार सोचा कि मैं भी 'रामायण' या किसी प्रसिद्द 'उपन्यास' या फ़िर कबीर और रहीम की रचनाओं को किश्तों में प्रकाशित कर अपने ब्लाग को सक्रिय बनाये रखूँ पर मन नहीं माना ! भला दूसरे की रचनाओं को पुनर्प्रकाशित करने में अपना 'मौलिक चिंतन' कहाँ है ! मेरा कहने का आशय यह है कि दूसरे विद्वानों के "वैचारिक टुकडों" पर पलने से बेहतर है कि आप कुछ न लिखें /ना लिख पायें ! सीमित लेखन से अधिक बुद्धिमत्ता की अभिव्यक्ति भले ही ना हो पर "कार्बन कापी" या "बौद्धिक टुकडखोर" होने से तो बेहतर है ! ब्लाग में स्वतंत्र , सार्थक और निज चिंतन पर आधारित लेखन नहीं कर पाने वाले ब्लागर्स को सक्रियता , लोकप्रियता की बेमानी दौड़ में पड़ने की आवश्यकता कहाँ है ? उचित हो कि वे कम लिखें पर अपना मौलिक तो लिखें !
मेरा अपना कोई बौद्धिक दावा नहीं किंतु किसी अन्य की कापी करने की इच्छा भी नहीं पालता ! सच पूछिए तो मुझे सुधन्या इसी लिए पसंद है कि महीनों से कुल जमा तीन पोस्ट लिखी हैं , उनकी रचनायें भले ही साहित्यिक क्लासिक श्रेणी की ना हों पर रचनाओं का मूल चिंतन , मूल सुर कम से कम अपना स्वयं का तो है ! प्रथम दृष्टया इश्क पगा , 'बे इंतिहा इश्कियाया' हुआ इंसान ! एक दम ओरिजनल !

Sunday, November 1, 2009

वर्षगांठ मनाते रहिये

आज राज्य का स्थापना दिवस है किसने क्या पाया क्या खोया ये तो चिंतन मनन और समीक्षा का विषय है , लेकिन चंद रोज पहले ही महारानी की यादें ताज़ा करके मित्र नें राज्य की स्वास्थ्य सेवाओ के कपड़े उतार दिए ! इधर मुद्दे और भी हैं नवोदित विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के नए मायने लिख रहा है ! जो अधिकारी 'देकर' आयें हैं वो 'लेकर' ही जायेंगे , इसमें किसी को आपत्ति क्यों होनी चाहिए ! आए दिन समाचार पत्रों के पन्ने रंगे हुए और छात्रों के आक्रोश के बाद भी नींद नहीं टूटी उच्चाधिकारियों की ! क्या कहें , क्यों कहें 'बस्तर' की तक़दीर में जो लिखा है वो उसे भुगत रहा है ! राज्य स्थापना दिवस के उपलक्ष में शासकीय भवन रौशनी से जगमग करते हुए कल से पुनः , अगली स्थापना दिवस का इन्तजार करते हुए अंधेरे में डूब जायेंगे !

Wednesday, October 14, 2009

हम इन 'क्लागर्स' के 'क्लाग' को खोलते ही नहीं !

कई महीनो से कुछ लिखा ही नहीं और अगर लिखा भी तो खालिस टिप्पणियां ! पढ़ा जरुर कई ब्लाग्स को , वाकई में अच्छे लगे ! जैसे आदित्यरंजन , उसे जब भी देखा मन हल्का हो गया ! घुघूती , उड़नतश्तरी , तस्लीम भी अच्छे लगे और भी कई ब्लाग्स हैं जिन्हें पढ़ना अच्छा लगा पर सबके नाम लिखना तो नामुमकिन ही है ना ! यूं तो कवितायें हमें अच्छी लगती हैं लेकिन ब्लाग जगत में तो जैसे अतिवृष्टि हो रही है ! हर दिन दो से तीन कवितायें झेलना काफी कष्टकर लगता है लेकिन कुछ लोग हैं कि बजाये जा रहे हैं !
पता नहीं क्यों हरेक बन्दा कवि होने के भ्रम में जी रहा है और समझने को तैयार ही नहीं कि पाठकों को कितना कष्ट होता है उनकी कवितायें ( अकवितायें ) पढ़कर ! वैसे हमने इसका तोड़ ये निकाला है कि हम इन 'क्लागर्स' के 'क्लाग' को खोलते ही नहीं ! भला क्या फायदा जब एक आध अच्छी कविता के लिए हजारों अकवितायें बर्दाश्त करना पड़ जायें ! अब मजबूरी में ही सही कहने का मतलब यह है कि हम क्लाग्स के बजाये ब्लाग्स पढ़ना ज्यादा पसंद करते हैं !

Sunday, January 4, 2009

क्या लिखूं ....

क्या लिखूं दिमाग फ्यूज़ हो चला है , बस सवाल दर सवाल हैं जबाब कुछ भी नहीं ! आपको पता है कि बस्तर में चुनाव हुए , शायद चुनाव आयोग काफी सख्त था ? इसलिए छोटे /मंझोले कर्मचारी फर्जी मतदान कराने के नाम पर गिरफ्तार और सेवा से निलंबित हो चुके हैं ! चूँकि वे पकड़े गए इसलिए चोर हुए और जो नहीं पकड़े गए वो ........?
यूँ तो चुनाव आयोग नें यहाँ के कमिश्नर और दो कलेक्टरों को चुनाव के बीचो बीच ट्रांसफर कर दिया था ! अब आप ही कहें ,ये ट्रांसफर निराधार या अकारण तो नहीं किये गये होंगे !
छोटे कर्मचारी निलंबित और गिरफ्तार !
बड़े अधिकारी केवल ट्रांसफर !
चुनाव आयोग की सख्ती ? समझ में नहीं आई ?

Friday, January 2, 2009

स्वजन ....

अंतरजाल स्वजन ,प्रिय अनन्या , पिछले अगस्त माह से , आपका 'की-बोर्ड' मौन है ! कम से कम २००९ में इस मौन को तोड़ो भई ! हमें आपके निशब्द की- बोर्ड के शब्द -शब्द हो जाने का इंतजार है ! मंगल कामनाओं सहित !

Wednesday, August 6, 2008

बस्तर या शेर का ......

कुछ दिनों पहले ब्लाग उम्मतें में एक लेख पढ़ा था कि 'बस्तर को क्या मिला ' कोई आश्चर्य नही कि बस्तर विषयक इस आलेख पर बस्तर शिरोमणियों ने कोई टिप्पणी नही दी !
समझना मुश्किल नहीं कि मध्य प्रदेश और नवगठित छत्तीसगढ़ राज्य में बस्तर की हालत जस की तस है !

खैर उक्त आलेख पर टिप्पणी नहीं आने का एक अर्थ मौन स्वीकृति भी माना जा सकता है अर्थात लेख में व्यक्त की गई चिंता से लोग चुप रह कर सहमत थे अन्यथा प्रतिवाद करते !

अभी कहीं पढ़ रहा था कि कुछ लोग बस्तर के नैसर्गिक सौन्दर्य से मोहित हैं तथा वे इसके दर्शन करने को बेताब हैं और इस रूप लावण्य को फ्रेम में मढा कर रखने के यत्न कर रहे हैं !


उन्हें बस्तर में शिक्षा /अशिक्षा /हिंसा /अहिंसा /शोषण/गरीबी / जनहानि से कोई लेना देना नहीं है चूँकि वे सौन्दर्य के पुजारी हैं इसलिए उन्हें केवल पर्यटन करना है ! आखिर वंचना (वंचित रहने ) का अपना ही सौन्दर्य शास्त्र है ! इसलिए बस्तर पर "वस्त्र" नहीं रहने से सौन्दर्य और निखरेगा !
आओ फोटो खींचे और छापें ठीक वैसे ही जैसे कोई "शिकारी" शेर का शिकार करके अन्तिम सांसें लेते हुए " शेर" के साथ गौरवान्वित होकर फोटो खिंचवाता है ! जैसे कोई शिकारी अपने ड्राइंग रूम में शिकार 'भैंसे या हिरन' का कटा सिर शील्ड की तरह टागंता हो ! आओ हम विकास /विनाश की सभी चिंताएं छोडें और बस्तर के 'नैसर्गिक सौन्दर्य' को अपने ड्राइंगरूम अरे ..... क्षमा करें ......ब्लाग में भी सजाएँ !

Friday, August 1, 2008

उम्मतें में गाँधी जी

मुझे लगता है ब्लाग उम्मतें को गाँधी जी से विशेष प्रेम है तभी तो घूम फ़िर कर गाँधी जी के बारे में लिख देते हैं वैसे गाँधी जी के प्रति आदर व्यक्त करने का बेहतरीन तरीका यही है !
मेरा ख्याल है कि आजादी के बाद गाँधी जी की जरुरत और बढ़ गई है !

वैसे (स्वर्ग में भी ) बापू इन दिनों देश का हाल चाल देख कर बहुत दुखी होंगे ! क्योंकि आज का भारत उनके सपनों का भारत तो कदापि नहीं है !